गुरु वंदना

दिखाए हमको रास्ता
बनी है इसपे आस्था
अंधेरे से निकालता है
नव प्रकाश गीत है !

ये ब्रह्म के समान है
धरा पे चारों ओर बस
इसी के यश का गान है
संवारे है, निखारे है
यही तो इसकी रीत है !

कभी है मेरु सा अचल 
कभी समुद्र सा सजल
विराट अपनी सोच में
स्वभाव से विनीत है !

प्रेम से भरा हृदय 
समस्त स्वार्थ से परे
ज्ञान की किरण है और
बोध का प्रतीक है !

निकाला हमको कूप से
बचाया हमको धूप से
गुरु तेरे चरण में ही तो
'सार्थक' की प्रीत है !

          ©️ दीपक शर्मा ' सार्थक'

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