ये मैं हूँ
ये मैं हूँ कभी ख़ुद को आईने में देख के इतराता कभी-कभी आईने से भी नज़रें चुराता थोड़ी सी खुशी में चूर-चूर थोड़े से ही ग़म में सबसे दूर-दूर छूटते पकड़ते, बिखरते संवरते और ऐसे ही हज़ार टुकड़ों में टूट कर आगे बढ़ जाता हूं ! हां ये मैं ही तो हूँ जो एक ख़्वाब टूटते ही उम्मीदों का धागा लेकर बुनने लगता है दूसरा ख्वाब दूसरे के बाद तीसरा तीसरे के बाद चौथा और ऐसे ही लाखों टूटे ख्वाबों के पिरामिड पर अकेला खड़ा खुद को पाता हूं ! हां-हां ये शायद मैं ही हूं जो अभी भी क़ैद है खुद के अंदर ही जो लड़ रहा है खुद के लिए, खुद से ही और ये भीषण महायुद्ध लड़ते हुए भी बिना लड़खड़ाए रोजमर्रा के काम कर रहा हूं कितना साधारण सा हूं मैं और कितना असाधारण हूं ! हां ये मैं हूँ ! © दीपक शर्मा ’सार्थक’