परिचय का परिचय
उस अबोध बच्चे ने हृदय से भगवान से केवल पढ़ना लिखना इस लिए मांगा था क्योंकि उसके मन में पढ़ने लिखने वालो को मिलने वाले खाने पीने की वस्तुएं देख कर लालच आ गया था। लेकिन शायद ईश्वर ने उसकी पुकार सुन ली। किसे पता था यही बच्चा आगे चलकर डॉक्टर गंगा प्रसाद शर्मा ’गुणशेखर’ के नाम से विख्यात होगा, शिक्षित होकर पी.एच.डी करेगा, लाल बहादुर शास्त्री आईएएस अकादमी में आईएएस को पढ़ाएगा, विदेश में जाकर हिंदी का नाम रौशन करेगा।
जब आज के समय मैं ये लिख रहा हूं तो कुछ लोगों को लग रहा होगा कि विदेश जाना, पी एच डी करना, जैसी चीजें कौन सी बड़ी बात है। आजकल तो जिसे देखो विदेश जा रहा है। पी एच डी कर रहा है।
लेकिन ऐसा नहीं है। मैं जिस टाइम की बात कर रहा हूं तब शमशेरपुर गांव से तहसील महमूदाबाद तक जाने में ( जिनके बीच की दूरी मात्र 30 km है) भी एक दिन का समय लग जाता था। घाघरा और चौका नदी के पेट में बसा शमशेरपुर गांव को शेष भारत से जोड़ने वाली सड़क को नदी काट देती थी। फिर बस नावों का ही सहारा होता था। केवल इतनी सी ही बात होती तो भी कुछ कहा जा सकता था। सच ये है की डॉ गंगा प्रसाद शर्मा का पढ़ लेना किसी चमत्कार से कम नहीं।
हमने बचपन से ही किताबो में पढ़ रखा है की कैसे लाल बहादुर शास्त्री नदी तैर कर पढ़ने जाते थे, कैसे लिंकन स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठ कर पढ़ते थे। लेकिन मेरे गांव के लाल बहादुर शास्त्री और लिंकन तो डॉ गंगा प्रसाद शर्मा ही हैं। उनकी पढ़ाई के किस्से आज भी पूरे गांव क्षेत्र में मशहूर हैं। आज भी न जाने कितने प्रत्यक्षदर्शी भावुक होकर उनके किस्से सुनाया करते हैं। केवल एक खटिया और बटुई ( खाना बनाने वाला बर्तन) ले जाकर कैसे लखनऊ में रहना, कैसे दिन में काम करना और रात में एक ढाबे में रहना। यहां तक अपनी इकलौती खटिया किराए और दे देना और खुद जमीन पर सोना, कैसे केवल लकड़ी की चैली जलाकर पढ़ना, कैसे होटल बंद होने के बाद उसकी भट्ठी में बची आग में अपनी बटुई में खिचड़ी पका कर खाना, आज उनसे जुड़ी इन छोटी–छोटी बातों ने कहानियों की शक्ल ले ली है।
सच कहूं तो आज जब भी उनको देखता हूं तो उनके बारे में सुनी कहानियों का मुझे अचरज नहीं होता। कोरोना काल में इंतहा बीमार होने के बाद भी उनमें एक गजब की स्फूर्ति है। उनकी आंखे आज भी इतनी जीवंत हैं की उनको देख के सब सहज लगता है। एक हफ्ते का प्रोग्राम बनाकर भी यदि सूरत से यहां आते हैं तो पूरा समय लोगो से मिलने और सफर में बीतता है। फोन करो पूछो,"चाचा कहां हैं" तो कभी लखनऊ में हैं, अगले दिन बनारस मे हैं, तो उसके अगले दिन गोंडा में हैं। इस उम्र में इतनी ऊर्जा मैने किसी में नहीं देखी।
कभी–कभी लगता है की हिंदी साहित्य का भाग्य है जो डॉ गंगा प्रसाद शर्मा ने उसे अपनी पहचान के लिए चुना। लिएंडर पेस का एक इंटरव्यू पढ़ा था जिनसे वो सचिन तेंदुलकर के बारे में अपना अनुभव साझा कर रहे थे। लिएंडर पेस के अनुसार एक बार इनका और सचिन का टेबिल टेनिस मैच हुआ। उस मैच में सचिन ने पेस को तीन राउंड में लगातार हराया। पेस बोलते हैं, "ये क्रिकेट का भाग्य है की सचिन ने इस खेल को चुना अगर वो कोई भी खेल खेलते तो उसमे नंबर वन होते।"
डॉ गंगा प्रसाद शर्मा की ऊर्जा और उनके व्यक्तित्व को देख कर मैं दावे के साथ कह सकता हूं। वो जो भी क्षेत्र चुनते उसमे अपना नाम रौशन करते। अगर वो खेती कर रहे होते तो बहुत ही अच्छे किसान होते।अगर वो व्यापार करते तो बहुत की उन्दा व्यापारी होते। कभी–कभी वो हंस के कहते भी है की ," बप्पा ने तो बहुत प्रयास किया की हम उनके गुड वाले व्यापार को सीख लें। इसीलिए जब वो लाडिया पर गुड़ लाद कर ले जाते तो हमको भी साथ में ले जाते। खूब मिठाई खिलाते। मन पसंद खाना खिलाते ताकि मेरा मन गुड़ के व्यापार में लग जाए, लेकिन हमको तो पढ़ना था।"
आज शायद ही हिंदी साहित्य या हिंदी से जुड़ा कोई व्यक्ति होगा जो उनको नहीं जनता। आज शायद ही हिंदी साहित्य का कोई मंच होगा, जहां तक उनकी पहुंच नहीं है। हिंदी मात्र उनके लिए कोई विषय भर नहीं है, हिंदी उनका स्वभाव है। आईएएस अकादमी में पूरे भारत के गैर हिंदी भाषी राज्यों से आए ट्रेनी को उन्होंने हिंदी व्याकरण को किसी इंजन के कलपुर्जों की तरह खोल के इसकी बारीकियों में पारंगत बना दिया।
हिंदी साहित्य उनकी आत्मा में बसा है। मुझे उनके साहित्य में सबसे अच्छा उनकी सरलता और सहजता लगती है। साधारण बातचीत के समय वो जितने सहज होते हैं, बड़े से बड़े मंच से भी बोलते समय उनमें वही सहजता होती है। वर्ना कुछ लोग तो ऐसे होते हैं की मंच पर पहुंचते समय ही उनका हाव–भाव, बोलने का लहजा सब कुछ बदल जाता है। मैने डॉ गंगा प्रसाद शर्मा को कई मंचो से बोलते देखा है, न ही किसी तरह के शब्दो का दोहराव, न ही मात्र दिखावे वाली शब्दकोश वाली क्लिष्टता, जिन भावों को व्यक्त करना चाहते हैं वो सरलता के साथ स्पष्ट रूप से व्यक्त हो जाते हैं। यही सरलता उनकी लेखनी में भी दिखती है। उनसे बात करते समय कुछ कठिन नहीं लगता, सब सरल हो जाता है। उनकी लेखनी में कभी भाव नही मरता। उनके हृदय की करुणा उनकी लेखनी में झलकती है।
इनके हृदय के यही भाव कई बार चर्चा का विषय बन जाते हैं। कभी गांव आकर हरिजन फल्लू की पत्नी के पैर छू लेते हैं और पूरे गांव को महीने भर के बातचीत का मुद्दा दे देते हैं।तो कभी गांव में फैले नशा रूपी व्यसन के खिलाफ हल्लाबोल देते हैं और नशेड़ी लोगो की आलोचना का शिकार हो जाते हैं।
मेरे लिए उनका परिचय लिख पाना कठिन था। क्योंकि वो मेरा परिचय हैं। मैं अक्सर अपना परिचय देता हूं की डॉ गंगा प्रसाद शर्मा ’गुणशेखर’ मेरे चाचा हैं। ऐसे में अपने परिचय का परिचय लिखना कठिन कार्य तो है ही।
मेरे जैसे व्यक्ति के साहित्य में रुझान का कारण ही यही है की वो मेरे चाचा हैं। वो मेरे साहित्यिक चेतना को जगाने वाले गुरु हैं। वो हमारे क्षेत्र के लिए एक उदाहरण है। न जाने कितने बाप अपने बेटे हो उनके किस्से सुनाते हैं। उनकी लगन का उदाहरण देते हैं। कैसे कोई अपने पराक्रम से अपनी परिस्थितियों को हरा देता हैं।
अंत में अपने लिखे एक शेर से बात खत्म करूंगा –
"कुछ किस्सों को हकीकत में बदलते देखा है
हमने एक बीज को दरख़्त होते देखा है!"
©️ दीपक शर्मा ’सार्थक’
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