मित्रता का वर्गीकरण

सोशल मीडिया के टाइम में एक चीज तो अच्छी है ही की अब किसी स्पेशल डे के बारे में याद रखने की जरूरत नहीं है। कोई भी स्पेशल डे होने पर पूरे सोशल मीडिया पर उससे सम्बन्धित शुभकामनाओं की सुनामी आ जाती है। मदर डे,फादर डे, वोमेन डे आदि–आदि डे के उपलक्ष्य में सोशल मीडिया रूपी ज्वाला मुखी दग उठता है। उसी क्रम में अभी मित्रता दिवस भी मनाया गाया। मित्र के लिए भी एक स्पेशल दिन है ये जान कर अच्छा लगा।
देखा जाए तो मित्रता के कई आयाम होते हैं। थोड़ा गहराई से अगर मूल्यांकन करें तो पता चलेगा की मनुष्यो में मित्रता के भाव पनपने के आधार क्या क्या होते हैं। मित्रता के कुछ उदाहरणों से अपनी बात रखता हूं _
(1) साझा हित वाली मित्रता – ऐसी मित्रता जहां पर दो व्यक्ति अपने अपने हितों को ध्यान में रखकर मित्रता करते हैं, वो साझा हित वाली मित्रता होती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण श्री राम और सुग्रीव की मित्रता है। इस मित्रता का आधार साझा हित था। बालि द्वारा सुग्रीव की पत्नी ’तारा’ का हरण करके सुग्रीव को राज्य से निकाल दिया था। बालि को हरा पाना सुग्रीव के बस की बात नहीं थी। वहीं श्री राम को अपनी अर्धंगनी सीता का पता लगाने के लिए एक सेना की आवश्यकता थी। इसी साझा  हित को ध्यान में रखते हुए, उन दोनो के बीच मित्रता हुई। जिसके तहत राम बालि को मार कर सुग्रीव की पत्नी वापस दिलाएंगे। उसके बदले सुग्रीव अपनी सेना के साथ सीता की खोज में श्री राम का साथ देंगे।हुआ भी यही.. लेकिन सुग्रीव के राजा बनने के छह महीने तक राम ने इंतजार किया। सुग्रीव भोग विलास में इस तरह खोए कि उनको राम को दिए वचन की सुध ही नहीं रही। बाद में जब श्री राम ने क्रोध में लक्ष्मण को सुग्रीव के पास भेजा तब जाकर सुग्रीव तैयार हुए।
आज भी सबसे ज्यादा मित्रता इसी समान हित को ध्यान में रखकर की जाती है। ये मित्रता कुछ वैसी ही है जैसे ’तू मेरी  पीठ खुजला.. मैं तेरी पीठ खुजलाऊ।’ ऐसे मित्रो को पता होता है की उनको एक दूसरे की जरूरत पड़ सकती है, बस इसीलिए वो मित्र होते हैं।
(2) राजनैतिक समझौता वाली मित्रता – ऐसी मित्रता राजनैतिक हित साधने के लिए की जाती है। इसका उदाहरण श्री राम और विभीषण की मित्रता से समझा जा सकता है। श्री राम ने लंका पर चढ़ाई कर दी थी। युद्ध होने ही वाला था, ऐसे समय विभीषण राम की शरण में आए। वाल्मिकी रामायण के अनुसार तो वानर दल के कई लोग विभीषण को मार डालने के पक्ष में थे। लेकिन श्री राम ने इसे एक अवसर की तरह लिया। उनको पता था की दुश्मन खेमे का इतने बड़े पद वाला व्यक्ति उनके काम आ सकता है। युद्ध केवल रणभूमि में नहीं लड़े जाते बल्कि रणनीति से लड़े जाते हैं। उन्होंने तुरंत बिना समय गवाएं विभीषण को लंका का राजा घोषित कर दिया। यहीं मुझे विभीषण समझ में नहीं आते। माना रावण में लाख बुराइयां थी। माना उसने विभीषण को भगा दिया था.. अगर ऐसा था तो विभीषण उसका साथ नहीं देते। शत्रु दल से जाकर मिल जाने की क्या आवश्यकता थी। रावण ने तो सीता हरण से भी कई बुरे कर्म किए थे। न जाने कितनी सुर, गंधर्व, नाग कन्याओं का उसने अपरहण किया। बल्कि कई के साथ तो उसने वीभत्स बलात्कार भी किया था। तब तो विभीषण का ज़मीर नहीं जागा। न ही वो रावण द्वारा कुबेर से जबरदस्ती छीनी गई लंका को ही छोड़ कर गए। सच तो ये है की जब उनको इसका अवसर दिखा की कोई रावण को मार सकता है। बस वो उनसे जा मिले।अगर ऐसा नही था तो जब राम ने उन्हें लंका का भावी राजा बनाने की बात कही तो वो क्यों तैयार हो गए ..वो मना कर देते।
आज भी राजनैतिक हित साधने वाली मित्रता का बोल बाला है। जिसका सबसे समसामयिक उदाहरण महाराष्ट्र सरकार है। ग्राम प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री के चुनाव तक ऐसी मित्रता ठोक के भाव में देखने को मिलती है।
(3) "दुश्मन का दुश्मन मित्र" वाली मित्रता –इस मित्रता को अवसरवादी मित्रता भी कह कहते हैं। इसमें माना पहले व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति से लड़ाई है।वही उसी दूसरे व्यक्ति की किसी तीसरे व्यक्ति से भी लड़ाई हो जाए तो पहला और तीसरा व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मित्र हो जाते हैं क्योंकि इस दोनो का शत्रु एक ही होता है।
ऐसी अवसरवादी मित्रता आम लोगों के बीच तो देखने को मिलती ही है लेकिन सबसे ज्यादा ऐसी मित्रता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए भारत की पाकिस्तान से नहीं बनती और साथ ही चीन से नही बनती तो ऐसे में चीन और पाकिस्तान में बहुत घनिष्ठता हो गई है। इस मित्रता का आधार मात्र इतना ही है की इन दोनो देशों की भारत से नही बनती।ऐसे ही कई उदाहरण है जैसे भारत और जापान की मित्रता क्योंकि दोनो की चीन से नही बनती। ऐसे ही अमेरिका और दक्षिण कोरिया की मित्रता है क्युकी दोनो की उत्तर कोरिया से नहीं बनती। 
(4)अहसान तले दबी मित्रता – ऐसी मित्रता में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को अपने अहसान तले दबा लेता है। दूसरा कृतज्ञ व्यक्ति पहले व्यक्ति के अहसान तले दबकर वो भी करने को मजबूर हो जाता है जो उसकी अंतरात्मा भी नही चाहती। इसका सबसे बड़ा उदाहरण दुर्योधन और कर्ण की मित्रता है। सूतपुत्र होने के कारण बहिस्कार के दर्द से गुजरते कर्ण को दुर्योधन ’अंग’ देश का राजा बना देता है। इतिहास गवाह है कर्ण कभी इस अहसान से उबर नहीं पाया। और न चाहते हुए भी कई ऐसे कृत्य किए को उसके जैसे महान व्यक्तित्व को शोभा नहीं देते थे।
आज भी ऐसी मित्रता के कई लोग शिकार हैं। आज भी ऐसी कई घटनाएं होती हैं जिनमे अहसान तले दबा व्यक्ति गलत का साथ दे बैठता है।
(5)स्वार्थ और लालच के आधार वाली मित्रता–ऐसी मित्रता के केंद्र में स्वार्थ होता है। ऐसे मित्र किसी विशेष स्वार्थ या किसी लालच वश आकर चिपकते हैं। जबतक उनका स्वार्थ पूरा नहीं हो जाता तब तक वो हर बात पर हां में हां मिलाएंगे, हर सही गलत बात पर दांत निकाल कर मुस्कुराएंगे। लेकिन जैसे ही ऐसे मित्रो का स्वार्थ पूरा होता है, वो लापता हो जाते हैं। ये सबसे निम्न स्तर वाली मित्रता होती है।
(6) सार्थक एवम सच्ची मित्रता– सच पूछो तो इस कटेगरी की मित्रता ही सच्ची मित्रता होती है।इसके आधार में प्रेम होता है। इसके कई उदाहरण हैं, जैसे श्री राम और निषादराज की मित्रता। इस मित्रता में लेश मात्र भी स्वार्थ नहीं है। पृथ्वी के सबसे बड़े राज्य के राजकुमार होकर भी राम छोटे से कबीले के राजा को मित्र बनाकर गले से लगा लेते हैं। वहीं जब भरत, राम को मनाने जंगल आते हैं तो यही निषाद राज भ्रम वश उन्हें राम का शत्रु समझ कर उनकी विकराल सेना का सामना अपने गिने चुने कबीले के लोगो के साथ करने को तैयार हो जाते हैं। उन्हें अपने जीने मरने की भी फिक्र नहीं रहती। 
ऐसे ही श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता है। जहां स्वार्थ नहीं,कोई पद प्रतिष्ठा का बंधन नहीं। ऐसी मित्रता का आधार केवल प्रेम और करुणा है। एक सुदामा है जो मांगने आए हैं लेकिन इतना संकुचित हैं की कुछ भी नहीं मांग पाते..एक कृष्ण हैं जो बिना मांगे ही उनको दोनो लोक दे देना चाहते हैं।
इसी तरह मित्रता के हजारों पौराणिक उदाहरण मिल जाएंगे।मित्रता मानवता का आभूषण है। ये सच है की बिना मित्र के जीवन अधूरा है। लेकिन साथ ही इसपर अरस्तु का लिखा एक कथन भी याद रखने वाला है, "मित्रता हमेशा सोच समझ कर करनी चाहिए। और यदि मित्र बन जाएं तो जीवन भर उस मित्रता को निभाएं।"

                        ©️ दीपक शर्मा ’सार्थक’


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