ट्रंप चाल
जिन्होंने ये खेल नहीं खेला उनको बता दूं, ये एक ऐसा खेल है जिसमें एक वेराइटी वाले पत्ते को ट्रंप मान किया जाता है। खेल में कोई कितना भी बड़ा पत्ता फेंके किन्तु यदि उसके सामने ट्रंप की दुक्की भी आ गई तो वो उस दूसरे पत्ते पर भारी मानी जाती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति को उनका ये रुतबा, उनके प्रभावशाली देश की अर्थव्यवस्था से मिला हुआ है। राम चरित मानस में एक चौपाई से इसे समझा जा सकता है
"परम स्वतंत्र न सिर पर कोई।
भावइ मनहिं करहु तुम्ह सोई॥"
और ये कोई आज की बात भी नहीं है, द्वितीय विश युद्ध
के बाद से ही अमेरिका ने विश्व में अपनी पकड़ इतनी मजबूत कर ली है कि आज वो पूरे विश्व का चौधरी बना फिर रहा है।
आज उस विषय पर चर्चा केवल इसलिए हो रही है क्योंकि अमेरिका ने ’एज1बी’ पर सालाना शुल्क एक लाख अमेरिकी डॉलर तक बढ़ा दिया है।टैरिफ वार के बीच ये एक और धमाका है जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था हिल गई है। सबसे ज्यादा (लगभग70%) ये बीजा धारी भारतीय ही हैं जो ’आई टी’ सेक्टर में लगे हुए हैं जिनका अब देश लौटना तय है।
अब सोचने वाली बात ये है कि लौटते समय इनके मन में क्या होगा ??
कोई मेरी माने तो एयरपोर्ट से अपने घर के बीच के सफर में ये सड़कों के आतंकवादी (ई रिक्शा) से टकराते हुए, सड़कों के बीच में जबरदस्ती सब्जियों और फलों के ठेले से उपजे बेतरतीब जाम से झुंझलाते हुए..बीच सड़क पर कुत्ते, गाय और इंसानों के सहअस्तित्व को निहारते हुए.. विकास के नाम पर त्यौहारों की बधाई देने के लिए जगह जगह लगे भीमकाय पोस्टरों पर छछूंदर छाप तथाकथित युवा नेताओं की फोटो देखते हुए ये लोग अपनी किस्मत को कोस रहे होगे, सोच रहे होंगे कि काश वो अमेरिका या यूरोप में क्यों नहीं पैदा हुए।
और अगर ये ऐसा कुछ सोच रहे हैं तो इसमें किसी के बुरा मानने वाली कोई बात भी नहीं है क्योंकि ये, पूरा एक दिन बर्बाद करके फ्री का सरकारी राशन लेने वाली भीड़ नहीं हैं, ये सरकार को टैक्स देते हैं। इन्हें इसके बदले में बस एक अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर और काम वाला माहौल चाहिए था, जो ये देश नहीं दे पाया, और इसीलिए इन्हें दूसरे देश की ओर मुंह करना पड़ा।
ये एक कड़वी बात है कि हम और चीन एक साथ आजाद हुए और हमारी भौगोलिक स्थिति लगभग एक ही जैसी है। एक और जहां चीन उत्पादन के मामले में विश्व की फैक्ट्री बन गया वहीं हमने क्या उत्पादन किया??
पैदा करने के नाम पर हमने बच्चे और कचरा पैदा दिया और और एंटरप्रेन्योर के नाम पर कुछ छछूंदर छाप युवा नेता पैदा किए हैं। जो थोड़ी बहुत प्रतिभा पैदा हुई उसे अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए विदेश की ओर मुंह करना पड़ा है। और उसी का खामियाजा आज वो बिचारे भुगत रहे हैं। अमेरिका से लात पड़ने पर न घर के रहे न घाट के।
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए बहुत बड़े अर्थशास्त्री होने की जरूरत नहीं है। अर्थव्यवस्था की मुख्यतः तीन घटक होते हैं
प्राथमिक सेक्टर – जिसमें कृषि और उससे जुड़े उत्पाद जैसे मत्स्य डेरी आदि
द्वितीय सेक्टर – जिसे विनिर्माण या आ औद्योगिक सेक्टर भी कहते हैं ये किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी कहलाती है, जिसमें औद्योगिक फैक्ट्रियां, निर्माण कारखाने आदि शामिल है।
तृतीय सक्टर – जिसे सेवा क्षेत्र भी बोलते हैं जिसमें सेवा से जुड़ी चीजें जैसे बैंकिंग शिक्षा स्वास्थ्य सेवा परिवहन आदि शामिल है।
एक तरफ जहां चीन ने आजादी के बाद द्वितीय यानी औद्योगिक क्षेत्र के विकास में परचम लहरा दिया, अपनी योजनाओं के तरह उसने विदेशी निवेश को अपने देश में तब तक नहीं आने दिया जब तक उसकी घरेलू कंपनियां उनसे कंपटीशन करने योग्य नहीं हो गई।
जबकि भारत में 1992 में नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह की सरकार ने खस्ता भारतीय अर्थव्यवस्था (जिसके पास केवल 7 दिन का ही फॉरेन रिजर्व बचा था) को बचाने के लिए विश्व बैंक के आगे हाथ फैलाया, अमेरिकी नेतृत्व वाली विश्व बैंक ने गरदन पर लात रख कर भारतीय अर्थव्यवस्था को भूमंडलीकरण ने नाम पर पूरे विश्व के लिए खोलने पर मजबूर कर दिया। इससे हुआ ये कि जो भारतीय लघु एवं मझिले उद्योग थे वो विश्व की बड़ी कंपनियों का सामना नहीं कर पाई और समय से पहले अपना दम तोड़ दिया।और हमारे देश में कभी औद्योगिकीकरण हो ही नहीं पाया। हम सीधे प्राथमिक सेक्टर के बाद तीसरे सेक्टर यानी सेवा क्षेत्र की ओर बढ़े।और इससे जो सबसे बड़ा पाप हुआ वो ये की हमने सेवा क्षेत्र को ही उद्योग बना लिया।
जैसे शिक्षा एक सेवा है लेकिन शिक्षा को उद्योग में बदल दिया, व्यापार के नाम पर जहां कोई उद्योग खुलना चाहिए था वहां प्राइवेट स्कूल (लुटखोरी का अड्डा) बन रहे हैं। ऐसे ही स्वास्थ्य सेवा को उद्योग बना दिया गया।
अब हम सेमीकंडक्टर उद्योग को बढ़वा देना चाहते हैं, औद्योगिकीकरण को बढ़वा देना चाहते हैं लेकिन सच पूछो तो काफी देर हो चुकी है।
बैठ के फ्री में खिलाने की संस्कृति, बिना काम के भत्ता देने की परंपरा, पूंजीकरण और इंफ्रास्ट्रक्चर पर अल्पनिवेश, शहरीकरण के नाम पर तबेलाकरण जहां जो पा रहा है घर बनवा रहा है न पानी का सही से निकास न कचरे का सही से प्रबंधन, ये ऐसी समस्याएं हैं यही समय पर नहीं चेते तो ये इस देश को खा जाएंगी।
अमेरिका में दो पार्टी हैं एक रिपब्लिकन और दूसरी डेमोक्रेट्स।
डेमोक्रेट्स पार्टी जहां सरकारी कल्याणकारी योजनाएं और जनता को और वहां आकर बसने वालों को फ्री में सुविधाएं देने के पक्ष में है वहीं रिपब्लिकन पार्टी काम करके खाने के कल्चर को बढ़वा देती है।
अमेरिका की रिपब्लिकन पार्टी जिससे इस समय डॉनल्ड ट्रंप राष्ट्रपति हैं, इसी पार्टी में एक और राष्ट्रपति हुए हैं ’रोनाल्ड रीगन’ उनका एक जोक सुनाकर अपनी बाद खत्म करूंगा।
रीगन बताते हैं कि एक बार उन्होंने अपने डेमोक्रेट्स दोस्त की बेटी से पूछा कि" तुम बड़ी होकर क्या बनना चाहती हो ?"
वो बोली, " मै बड़ी होकर राष्ट्रपति बनूंगी"
रीगन ने पूछा ,“राष्ट्रपति बनकर पहला काम क्या करोगी?"
वो बच्ची बोली, " मै सभी बेघर लोगों को फ्री में घर और भोजन दूंगी"
उसके डेमोक्रेट्स माता पिता ये सुनकर बहुत खुश हुए।
तब रीगन ने कहा, "लेकिन तुम्हे ये काम करने लिए राष्ट्रपति बनने का इंतजार करने की कोई जरूरत नहीं, तुम मेरे घर चलो, मेरे लॉन की घास काट दो सफाई कर दो।मै तुम्हे 50 डॉलर दूंगा, उससे तुम अच्छा खाना खरीद कर किसी गरीब को दे देना।"
उस बच्ची ने कुछ देर सोचा और फिर सीधे रीगन की आंखों में देख कर पूछा, " लेकिन वो बेघर आदमी सीधे आपके पास काम करने क्यों नहीं आता, आप उसे सीधे 50 डॉलर दे देना।"
रीगन बोले , " रिपब्लिकन पार्टी में आपका स्वागत है।"
यही कुछ हमारे देश में होने की आवश्यकता है
©दीपक शर्मा ’सार्थक’
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